मुर्दा इंसान
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मुर्दों के बीच
जब मुर्दा होने लगो,
जब दिन-रात
सरेआम
लुटने लगे आबरू,
जब माँऐ स्वयं ही
मार दे कोख में बेटियों को,
जब औरतें खुद लूटने लगे
इज्ज़त औरतों की,
जब मंदिर-मस्जिद-गुरूद्वारे के
नाम पर होने लगे राजनीति,
जब गंगा मैया के
नाम पर हो करोड़ों का घोटाले,
जब बेमतलब सभा,दौरों के
नाम पर बहे पानी-सा पैसा,
जब लहलहाते फसलें
सूखे पानी बिन,
जब पेड़ों पर फल-फूलों के जगह
लटकते हों किसान,
जब नसों में खून की जगह
बहते हों नफरतों की धार,
जब लव-जिहाद के नाम पर
फैला हो देश में अराजकता,
तब कहिये
हम मनुष्य हैं
या मुर्दा इंसान।।
ज्योति रीता
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मुर्दों के बीच
जब मुर्दा होने लगो,
जब दिन-रात
सरेआम
लुटने लगे आबरू,
जब माँऐ स्वयं ही
मार दे कोख में बेटियों को,
जब औरतें खुद लूटने लगे
इज्ज़त औरतों की,
जब मंदिर-मस्जिद-गुरूद्वारे के
नाम पर होने लगे राजनीति,
जब गंगा मैया के
नाम पर हो करोड़ों का घोटाले,
जब बेमतलब सभा,दौरों के
नाम पर बहे पानी-सा पैसा,
जब लहलहाते फसलें
सूखे पानी बिन,
जब पेड़ों पर फल-फूलों के जगह
लटकते हों किसान,
जब नसों में खून की जगह
बहते हों नफरतों की धार,
जब लव-जिहाद के नाम पर
फैला हो देश में अराजकता,
तब कहिये
हम मनुष्य हैं
या मुर्दा इंसान।।
ज्योति रीता
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